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Sunday, September 1, 2019

समास किसे कहते है ~ samas in hindi~hindi grammar

 समास किसे कहते है ~ samas in hindi  ~hindi grammar 

हेलो दोस्तों फिर से आप सभी का class 24×7 हिंदी ब्लॉग में स्वागत है, आज की इस पोस्ट में हम बात करने वाले है SAMAS IN HINDI तथा samas ke bhed जो की हिंदी व्याकरण का महत्वपूर्ण भाग है आदि को फूल डिटेल में बताने वाला हू तो चलिए शुरू करते है


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Samas ke bhed
समास 



विषय सूची



Samas in hindi

अनेक शब्दों को संक्षिप्त करके नए शब्द बनाने की प्रक्रिया समास कहलाती है।
दूसरे अर्थ में- कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक अर्थ प्रकट करना 'समास' कहलाता है।

Samas ki paribhasha


दो या अधिक शब्दों (पदों) का परस्पर संबद्ध बतानेवाले शब्दों अथवा प्रत्ययों का लोप होने पर उन दो या अधिक शब्दों से जो एक स्वतन्त्र शब्द बनता है, उस शब्द को सामासिक शब्द कहते है और उन दो या अधिक शब्दों का जो संयोग होता है, वह समास कहलाता है।
समास में कम-से-कम दो पदों का योग होता है।
वे दो या अधिक पद एक पद हो जाते है: 'एकपदीभावः समासः'।
समास में समस्त होनेवाले पदों का विभक्ति-प्रत्यय लुप्त हो जाता है।
समस्त पदों के बीच सन्धि की स्थिति होने पर सन्धि अवश्य होती है। यह नियम संस्कृत तत्सम में अत्यावश्यक है।
समास की प्रक्रिया से बनने वाले शब्द को समस्तपद कहते हैं; जैसे- देशभक्ति, मुरलीधर, राम-लक्ष्मण, चौराहा, महात्मा तथा रसोईघर आदि।

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समस्तपद का विग्रह करके उसे पुनः पहले वाली स्थिति में लाने की प्रक्रिया को समास-विग्रह कहते हैं; जैसे- देश के लिए भक्ति; मुरली को धारण किया है जिसने; राम और लक्ष्मण; चार राहों का समूह; महान है जो आत्मा; रसोई के लिए घर आदि।
समस्तपद में मुख्यतः दो पद होते हैं- पूर्वपद तथा उत्तरपद।
पहले वाले पद को पूर्वपद कहा जाता है तथा बाद वाले पद को उत्तरपद; जैसे-

राजपुत्र(समस्तपद) - राजा(पूर्वपद) + पुत्र(उत्तरपद) - राजा का पुत्र (समास-विग्रह)

Samas ke bhed


समास के मुख्य सात भेद है:-

  1. तत्पुरुष समास ( Determinative Compound)
  2. कर्मधारय समास (Appositional Compound)
  3. द्विगु समास (Numeral Compound)
  4. बहुव्रीहि समास (Attributive Compound)
  5. द्वन्द समास (Copulative Compound)
  6. अव्ययीभाव समास(Adverbial Compound)
  7. नञ समास

(1)तत्पुरुष समास :- 


जिस समास में बाद का अथवा उत्तरपद प्रधान होता है तथा दोनों पदों के बीच का कारक-चिह्न लुप्त हो जाता है, उसे तत्पुरुष समास कहते है।
जैसे-
तुलसीकृत= तुलसी से कृत
शराहत= शर से आहत
राहखर्च= राह के लिए खर्च
राजा का कुमार= राजकुमार
तत्पुरुष समास में अन्तिम पद प्रधान होता है। इस समास में साधारणतः प्रथम पद विशेषण और द्वितीय पद विशेष्य होता है। द्वितीय पद, अर्थात बादवाले पद के विशेष्य होने के कारण इस समास में उसकी प्रधानता रहती है।

तत्पुरुष समास के भेद


तत्पुरुष समास के छह भेद होते है-

  • (i)कर्म तत्पुरुष
  • (ii) करण तत्पुरुष
  • (iii)सम्प्रदान तत्पुरुष
  • (iv)अपादान तत्पुरुष
  • (v)सम्बन्ध तत्पुरुष
  • (vi)अधिकरण तत्पुरुष

(i)कर्म तत्पुरुष (द्वितीया तत्पुरुष)-


इसमें कर्म कारक की विभक्ति 'को' का लोप हो जाता है। जैसे-
समस्त-पदविग्रह
स्वर्गप्राप्तस्वर्ग (को) प्राप्त
कष्टापत्रकष्ट (को) आपत्र (प्राप्त)
आशातीतआशा (को) अतीत
गृहागतगृह (को) आगत
सिरतोड़सिर (को) तोड़नेवाला
चिड़ीमारचिड़ियों (को) मारनेवाला
सिरतोड़सिर (को) तोड़नेवाला
गगनचुंबीगगन को चूमने वाला
यशप्राप्तयश को प्राप्त
ग्रामगतग्राम को गया हुआ
रथचालकरथ को चलाने वाला
जेबकतराजेब को कतरने वाला

(ii) करण तत्पुरुष (तृतीया तत्पुरुष)-


इसमें करण कारक की विभक्ति 'से', 'के द्वारा' का लोप हो जाता है। जैसे-
समस्त-पदविग्रह
वाग्युद्धवाक् (से) युद्ध
आचारकुशलआचार (से) कुशल
तुलसीकृततुलसी (से) कृत
कपड़छनाकपड़े (से) छना हुआ
मुँहमाँगामुँह (से) माँगा
रसभरारस (से) भरा
करुणागतकरुणा से पूर्ण
भयाकुलभय से आकुल
रेखांकितरेखा से अंकित
शोकग्रस्तशोक से ग्रस्त
मदांधमद से अंधा
मनचाहामन से चाहा
सूररचितसूर द्वारा रचित

(iii)सम्प्रदान तत्पुरुष (चतुर्थी तत्पुरुष)-


इसमें संप्रदान कारक की विभक्ति 'के लिए' लुप्त हो जाती है। जैसे-
समस्त-पदविग्रह
देशभक्तिदेश (के लिए) भक्ति
विद्यालयविद्या (के लिए) आलय
रसोईघररसोई (के लिए) घर
हथकड़ीहाथ (के लिए) कड़ी
राहखर्चराह (के लिए) खर्च
पुत्रशोकपुत्र (के लिए) शोक
स्नानघरस्नान के लिए घर
यज्ञशालायज्ञ के लिए शाला
डाकगाड़ीडाक के लिए गाड़ी
गौशालागौ के लिए शाला
सभाभवनसभा के लिए भवन
लोकहितकारीलोक के लिए हितकारी
देवालयदेव के लिए आलय

(iv)अपादान तत्पुरुष (पंचमी तत्पुरुष)-


इसमे अपादान कारक की विभक्ति 'से' (अलग होने का भाव) लुप्त हो जाती है। जैसे-
समस्त-पदविग्रह
दूरागतदूर से आगत
जन्मान्धजन्म से अन्ध
रणविमुखरण से विमुख
देशनिकालादेश से निकाला
कामचोरकाम से जी चुरानेवाला
नेत्रहीननेत्र (से) हीन
धनहीनधन (से) हीन
पापमुक्तपाप से मुक्त
जलहीनजल से हीन

(v)सम्बन्ध तत्पुरुष (षष्ठी तत्पुरुष)-


इसमें संबंधकारक की विभक्ति 'का', 'के', 'की' लुप्त हो जाती है। जैसे-
समस्त-पदविग्रह
विद्याभ्यासविद्या का अभ्यास
सेनापतिसेना का पति
पराधीनपर के अधीन
राजदरबारराजा का दरबार
श्रमदानश्रम (का) दान
राजभवनराजा (का) भवन
राजपुत्रराजा (का) पुत्र
देशरक्षादेश की रक्षा
शिवालयशिव का आलय
गृहस्वामीगृह का स्वामी

(vi)अधिकरण तत्पुरुष (सप्तमी तत्पुरुष)-


इसमें अधिकरण कारक की विभक्ति 'में', 'पर' लुप्त जो जाती है। जैसे-
समस्त-पदविग्रह
विद्याभ्यासविद्या का अभ्यास
गृहप्रवेशगृह में प्रवेश
नरोत्तमनरों (में) उत्तम
पुरुषोत्तमपुरुषों (में) उत्तम
दानवीरदान (में) वीर
शोकमग्नशोक में मग्न
लोकप्रियलोक में प्रिय
कलाश्रेष्ठकला में श्रेष्ठ
आनंदमग्नआनंद में मग्न

(2)कर्मधारय समास:-


जिस समस्त-पद का उत्तरपद प्रधान हो तथा पूर्वपद व उत्तरपद में उपमान-उपमेय अथवा विशेषण-विशेष्य संबंध हो, कर्मधारय समास कहलाता है।
दूसरे शब्दों में-कर्ता-तत्पुरुष को ही कर्मधारय कहते हैं।
पहचान: विग्रह करने पर दोनों पद के मध्य में 'है जो', 'के समान' आदि आते है।
जिस तत्पुरुष समास के समस्त होनेवाले पद समानाधिकरण हों, अर्थात विशेष्य-विशेषण-भाव को प्राप्त हों, कर्ताकारक के हों और लिंग-वचन में समान हों, वहाँ 'कर्मधारयतत्पुरुष समास होता है।

समस्त-पदविग्रह
नवयुवकनव है जो युवक
पीतांबरपीत है जो अंबर
परमेश्र्वरपरम है जो ईश्र्वर
नीलकमलनील है जो कमल
महात्मामहान है जो आत्मा
कनकलताकनक की-सी लता
प्राणप्रियप्राणों के समान प्रिय
देहलतादेह रूपी लता
लालमणिलाल है जो मणि
नीलकंठनीला है जो कंठ
महादेवमहान है जो देव
अधमराआधा है जो मरा
परमानंदपरम है जो आनंद

कर्मधारय तत्पुरुष के भेद


कर्मधारय तत्पुरुष के चार भेद है-


  • (i)विशेषणपूर्वपद 
  • (ii) विशेष्यपूर्वपद 
  • (iii) विशेषणोभयपद
  • (iv)विशेष्योभयपद


(i) विशेषणपूर्वपद :-


इसमें पहला पद विशेषण होता है।
जैसे- पीत अम्बर= पीताम्बर
परम ईश्वर= परमेश्वर
नीली गाय= नीलगाय
प्रिय सखा= प्रियसखा

(ii) विशेष्यपूर्वपद :-

इसमें पहला पद विशेष्य होता है और इस प्रकार के सामासिक पद अधिकतर संस्कृत में मिलते है।
जैसे- कुमारी (क्वाँरी लड़की)
श्रमणा (संन्यास ग्रहण की हुई )=कुमारश्रमणा।

(iii) विशेषणोभयपद :-


इसमें दोनों पद विशेषण होते है।
जैसे- नील-पीत (नीला-पी-ला ); शीतोष्ण (ठण्डा-गरम ); लालपिला; भलाबुरा; दोचार कृताकृत (किया-बेकिया, अर्थात अधूरा छोड़ दिया गया); सुनी-अनसुनी; कहनी-अनकहनी।

(iv) विशेष्योभयपद:-


इसमें दोनों पद विशेष्य होते है।
जैसे- आमगाछ या आम्रवृक्ष, वायस-दम्पति।

कर्मधारयतत्पुरुष समास के उपभेद

कर्मधारयतत्पुरुष समास के अन्य उपभेद हैं- 


  • (i) उपमानकर्मधारय
  • (ii) उपमितकर्मधारय
  • (iii) रूपककर्मधारय

जिससे किसी की उपमा दी जाये, उसे 'उपमान' और जिसकी उपमा दी जाये, उसे 'उपमेय' कहा जाता है। घन की तरह श्याम =घनश्याम- यहाँ 'घन' उपमान है और 'श्याम' उपमेय।

(i) उपमानकर्मधारय- 

इसमें उपमानवाचक पद का उपमेयवाचक पद के साथ समास होता हैं। इस समास में दोनों शब्दों के बीच से 'इव' या 'जैसा' अव्यय का लोप हो जाता है और दोनों ही पद, चूँकि एक ही कर्ताविभक्ति, वचन और लिंग के होते है, इसलिए समस्त पद कर्मधारय-लक्षण का होता है।
अन्य उदाहरण- विद्युत्-जैसी चंचला =विद्युच्चंचला।

(ii) उपमितकर्मधारय- 

यह उपमानकर्मधारय का उल्टा होता है, अर्थात इसमें उपमेय पहला पद होता है और उपमान दूसरा। जैसे- अधरपल्लव के समान = अधर-पल्लव; नर सिंह के समान =नरसिंह।
किन्तु, जहाँ उपमितकर्मधारय- जैसा 'नर सिंह के समान' या 'अधर पल्लव के समान' विग्रह न कर अगर 'नर ही सिंह या 'अधर ही पल्लव'- जैसा विग्रह किया जाये, अर्थात उपमान-उपमेय की तुलना न कर उपमेय को ही उपमान कर दिया जाय-
दूसरे शब्दों में, जहाँ एक का दूसरे पर आरोप कर दिया जाये, वहाँ रूपककर्मधारय होगा। उपमितकर्मधारय और रूपककर्मधारय में विग्रह का यही अन्तर है। रूपककर्मधारय के अन्य उदाहरण- मुख ही है चन्द्र = मुखचन्द्र; विद्या ही है रत्न = विद्यारत्न भाष्य (व्याख्या) ही है अब्धि (समुद्र)= भाष्याब्धि।


(3) द्विगु समास:-

जिस समस्त-पद का पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण हो, वह द्विगु कर्मधारय समास कहलाता है।
जैसे-
समस्त-पदविग्रह
सप्तसिंधुसात सिंधुओं का समूह
दोपहरदो पहरों का समूह
त्रिलोकतीनों लोको का समाहार
तिरंगातीन रंगों का समूह
दुअत्रीदो आनों का समाहार
पंचतंत्रपाँच तंत्रों का समूह
पंजाबपाँच आबों (नदियों) का समूह
पंचरत्नपाँच रत्नों का समूह
नवरात्रिनौ रात्रियों का समूह
त्रिवेणीतीन वेणियों (नदियों) का समूह
सतसईसात सौ दोहों का समूह

द्विगु के भेद


इसके दो भेद होते है-


  • (i)समाहारद्विगु
  • (ii)उत्तरपदप्रधानद्विगु।

(i) समाहारद्विगु :- 


समाहार का अर्थ है 'समुदाय' 'इकट्ठा होना' 'समेटना'।
जैसे- तीनों लोकों का समाहार= त्रिलोक
पाँचों वटों का समाहार= पंचवटी
पाँच सेरों का समाहार= पसेरी
तीनो भुवनों का समाहार= त्रिभुवन

(ii) उत्तरपदप्रधानद्विगु:-


उत्तरपदप्रधान द्विगु के दो प्रकार है-
(a) बेटा या उत्पत्र के अर्थ में; जैसे- दो माँ का- द्वैमातुर या दुमाता; दो सूतों के मेल का- दुसूती;
(b) जहाँ सचमुच ही उत्तरपद पर जोर हो; जैसे- पाँच प्रमाण (नाम) =पंचप्रमाण; पाँच हत्थड़ (हैण्डिल)= पँचहत्थड़।
द्रष्टव्य- अनेक बहुव्रीहि समासों में भी पूर्वपद संख्यावाचक होता है। ऐसी हालत में विग्रह से ही जाना जा सकता है कि समास बहुव्रीहि है या द्विगु। यदि 'पाँच हत्थड़ है जिसमें वह =पँचहत्थड़' विग्रह करें, तो यह बहुव्रीहि है और 'पाँच हत्थड़' विग्रह करें, तो द्विगु।
तत्पुरुष समास के इन सभी प्रकारों में ये विशेषताएँ पायी जाती हैं-
(i) यह समास दो पदों के बीच होता है।
(ii) इसके समस्त पद का लिंग उत्तरपद के अनुसार हैं।
(iii) इस समास में उत्तरपद का ही अर्थ प्रधान होता हैं।

(4)बहुव्रीहि समास:- 

समास में आये पदों को छोड़कर जब किसी अन्य पदार्थ की प्रधानता हो, तब उसे बहुव्रीहि समास कहते है।
दूसरे शब्दों में- जिस समास में पूर्वपद तथा उत्तरपद- दोनों में से कोई भी पद प्रधान न होकर कोई अन्य पद ही प्रधान हो, वह बहुव्रीहि समास कहलाता है।
जैसे- दशानन- दस मुहवाला- रावण।
जिस समस्त-पद में कोई पद प्रधान नहीं होता, दोनों पद मिल कर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करते है, उसमें बहुव्रीहि समास होता है। 'नीलकंठ', नीला है कंठ जिसका अर्थात शिव। यहाँ पर दोनों पदों ने मिल कर एक तीसरे पद 'शिव' का संकेत किया, इसलिए यह बहुव्रीहि समास है।
इस समास के समासगत पदों में कोई भी प्रधान नहीं होता, बल्कि पूरा समस्तपद ही किसी अन्य पद का विशेषण होता है।

समस्त-पदविग्रह
प्रधानमंत्रीमंत्रियो में प्रधान है जो (प्रधानमंत्री)
पंकज(पंक में पैदा हो जो (कमल)
अनहोनीन होने वाली घटना (कोई विशेष घटना)
निशाचरनिशा में विचरण करने वाला (राक्षस)
चौलड़ीचार है लड़ियाँ जिसमे (माला)
विषधर(विष को धारण करने वाला (सर्प)
मृगनयनीमृग के समान नयन हैं जिसके अर्थात सुंदर स्त्री
त्रिलोचनतीन लोचन हैं जिसके अर्थात शिव
महावीरमहान वीर है जो अर्थात हनुमान
सत्यप्रियसत्य प्रिय है जिसे अर्थात विशेष व्यक्ति

तत्पुरुष और बहुव्रीहि में अन्तर- 


तत्पुरुष और बहुव्रीहि में यह भेद है कि तत्पुरुष में प्रथम पद द्वितीय पद का विशेषण होता है, जबकि बहुव्रीहि में प्रथम और द्वितीय दोनों पद मिलकर अपने से अलग किसी तीसरे के विशेषण होते है।
जैसे- 'पीत अम्बर =पीताम्बर (पीला कपड़ा )' कर्मधारय तत्पुरुष है तो 'पीत है अम्बर जिसका वह- पीताम्बर (विष्णु)' बहुव्रीहि। इस प्रकार, यह विग्रह के अन्तर से ही समझा जा सकता है कि कौन तत्पुरुष है और कौन बहुव्रीहि। विग्रह के अन्तर होने से समास का और उसके साथ ही अर्थ का भी अन्तर हो जाता है। 'पीताम्बर' का तत्पुरुष में विग्रह करने पर 'पीला कपड़ा' और बहुव्रीहि में विग्रह करने पर 'विष्णु' अर्थ होता है।

बहुव्रीहि समास के भेद

बहुव्रीहि समास के चार भेद है-


  • (i) समानाधिकरणबहुव्रीहि 
  • (ii) व्यधिकरणबहुव्रीहि 
  • (iii) तुल्ययोगबहुव्रीहि 
  • (iv)व्यतिहारबहुव्रीहि


(i) समानाधिकरणबहुव्रीहि :- 


इसमें सभी पद प्रथमा, अर्थात कर्ताकारक की विभक्ति के होते है; किन्तु समस्तपद द्वारा जो अन्य उक्त होता है, वह कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध, अधिकरण आदि विभक्ति-रूपों में भी उक्त हो सकता है।
जैसे- प्राप्त है उदक जिसको =प्राप्तोदक (कर्म में उक्त);
जीती गयी इन्द्रियाँ है जिसके द्वारा =जितेन्द्रिय (करण में उक्त);
दत्त है भोजन जिसके लिए =दत्तभोजन (सम्प्रदान में उक्त);
निर्गत है धन जिससे =निर्धन (अपादान में उक्त);
पीत है अम्बर जिसका =पीताम्बर;
मीठी है बोली जिसकी =मिठबोला;
नेक है नाम जिसका =नेकनाम (सम्बन्ध में उक्त);
चार है लड़ियाँ जिसमें =चौलड़ी;
सात है खण्ड जिसमें =सतखण्डा (अधिकरण में उक्त)।

(ii) व्यधिकरणबहुव्रीहि :-


समानाधिकरण में जहाँ दोनों पद प्रथमा या कर्ताकारक की विभक्ति के होते है, वहाँ पहला पद तो प्रथमा विभक्ति या कर्ताकारक की विभक्ति के रूप का ही होता है, जबकि बादवाला पद सम्बन्ध या अधिकरण कारक का हुआ करता है। जैसे- शूल है पाणि (हाथ) में जिसके =शूलपाणि;
वीणा है पाणि में जिसके =वीणापाणि।

(iii) तुल्ययोगबहुव्रीहिु:-


जिसमें पहला पद 'सह' हो, वह तुल्ययोगबहुव्रीहि या सहबहुव्रीहि कहलाता है।
'सह' का अर्थ है 'साथ' और समास होने पर 'सह' की जगह केवल 'स' रह जाता है। इस समास में यह ध्यान देने की बात है कि विग्रह करते समय जो 'सह' (साथ) बादवाला या दूसरा शब्द प्रतीत होता है, वह समास में पहला हो जाता है।
जैसे- जो बल के साथ है, वह=सबल; जो देह के साथ है, वह सदेह; जो परिवार के साथ है, वह सपरिवार; जो चेत (होश) के साथ है, वह =सचेत।

(iv)व्यतिहारबहुव्रीहि:-


जिससे घात-प्रतिघात सूचित हो, उसे व्यतिहारबहुव्रीहि कहा जाता है।
इ समास के विग्रह से यह प्रतीत होता है कि 'इस चीज से और इस या उस चीज से जो लड़ाई हुई'।
जैसे- मुक्के-मुक्के से जो लड़ाई हुई =मुक्का-मुक्की; घूँसे-घूँसे से जो लड़ाई हुई =घूँसाघूँसी; बातों-बातों से जो लड़ाई हुई =बाताबाती। इसी प्रकार, खींचातानी, कहासुनी, मारामारी, डण्डाडण्डी, लाठालाठी आदि।
इन चार प्रमुख जातियों के बहुव्रीहि समास के अतिरिक्त इस समास का एक प्रकार और है। जैसे-

बहुव्रीहि समास की विशेषताएँ


बहुव्रीहि समास की निम्नलिखित विशेषताएँ है-


  1. यह दो या दो से अधिक पदों का समास होता है।
  2. इसका विग्रह शब्दात्मक या पदात्मक न होकर वाक्यात्मक होता है।
  3. इसमें अधिकतर पूर्वपद कर्ता कारक का होता है या विशेषण।
  4. इस समास से बने पद विशेषण होते है। अतः उनका लिंग विशेष्य के अनुसार होता है।
  5. इसमें अन्य पदार्थ प्रधान होता है।


(5)द्वन्द्व समास :- 


जिस समस्त-पद के दोनों पद प्रधान हो तथा विग्रह करने पर 'और', 'अथवा', 'या', 'एवं' लगता हो वह द्वन्द्व समास कहलाता है।
समस्त-पदविग्रह
रात-दिनरात और दिन
सुख-दुखसुख और दुख
दाल-चावलदाल और चावल
भाई-बहनभाई और बहन
माता-पितामाता और पिता
ऊपर-नीचेऊपर और नीचे
गंगा-यमुनागंगा और यमुना
दूध-दहीदूध और दही
आयात-निर्यातआयात और निर्यात
देश-विदेशदेश और विदेश
आना-जानाआना और जाना
राजा-रंकराजा और रंक

पहचान : दोनों पदों के बीच प्रायः योजक चिह्न (Hyphen (-) का प्रयोग होता है।
द्वन्द्व समास में सभी पद प्रधान होते है। द्वन्द्व और तत्पुरुष से बने पदों का लिंग अन्तिम शब्द के अनुसार होता है।

द्वन्द्व समास के भेद


द्वन्द्व समास के तीन भेद है-


  • (i) इतरेतर द्वन्द्व
  • (ii) समाहार द्वन्द्व 
  • (iii) वैकल्पिक द्वन्द्व


(i) इतरेतर द्वन्द्व-: 


वह द्वन्द्व, जिसमें 'और' से सभी पद जुड़े हुए हो और पृथक् अस्तित्व रखते हों, 'इतरेतर द्वन्द्व' कहलता है।
इस समास से बने पद हमेशा बहुवचन में प्रयुक्त होते है; क्योंकि वे दो या दो से अधिक पदों के मेल से बने होते है।
जैसे- राम और कृष्ण =राम-कृष्ण
ऋषि और मुनि =ऋषि-मुनि
गाय और बैल =गाय-बैल
भाई और बहन =भाई-बहन
माँ और बाप =माँ-बाप
बेटा और बेटी =बेटा-बेटी इत्यादि।
यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि इतरेतर द्वन्द्व में दोनों पद न केवल प्रधान होते है, बल्कि अपना अलग-अलग अस्तित्व भी रखते है।

(ii) समाहार द्वन्द्व-

समाहार का अर्थ है समष्टि या समूह। जब द्वन्द्व समास के दोनों पद और समुच्चयबोधक से जुड़े होने पर भी पृथक-पृथक अस्तित्व न रखें, बल्कि समूह का बोध करायें, तब वह समाहार द्वन्द्व कहलाता है।
समाहार द्वन्द्व में दोनों पदों के अतिरिक्त अन्य पद भी छिपे रहते है और अपने अर्थ का बोध अप्रत्यक्ष रूप से कराते है।
जैसे- आहारनिद्रा =आहार और निद्रा (केवल आहार और निद्रा ही नहीं, बल्कि इसी तरह की और बातें भी);
दालरोटी=दाल और रोटी (अर्थात भोजन के सभी मुख्य पदार्थ);
हाथपाँव =हाथ और पाँव (अर्थात हाथ और पाँव तथा शरीर के दूसरे अंग भी )
इसी तरह नोन-तेल, कुरता-टोपी, साँप-बिच्छू, खाना-पीना इत्यादि।
कभी-कभी विपरीत अर्थवाले या सदा विरोध रखनेवाले पदों का भी योग हो जाता है। जैसे- चढ़ा-ऊपरी, लेन-देन, आगा-पीछा, चूहा-बिल्ली इत्यादि।
जब दो विशेषण-पदों का संज्ञा के अर्थ में समास हो, तो समाहार द्वन्द्व होता है।
जैसे- लंगड़ा-लूला, भूखा-प्यास, अन्धा-बहरा इत्यादि।
उदाहरण- लँगड़े-लूले यह काम नहीं क्र सकते; भूखे-प्यासे को निराश नहीं करना चाहिए; इस गाँव में बहुत-से अन्धे-बहरे है।
द्रष्टव्य- यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि जब दोनों पद विशेषण हों और विशेषण के ही अर्थ में आयें तब वहाँ द्वन्द्व समास नहीं होता, वहाँ कर्मधारय समास हो जाता है। जैसे- लँगड़ा-लूला आदमी यह काम नहीं कर सकता; भूखा-प्यासा लड़का सो गया; इस गाँव में बहुत-से लोग अन्धे-बहरे हैं- इन प्रयोगों में 'लँगड़ा-लूला', 'भूखा-प्यासा' और 'अन्धा-बहरा' द्वन्द्व समास नहीं हैं।

(iii) वैकल्पिक द्वन्द्व:-

जिस द्वन्द्व समास में दो पदों के बीच 'या', 'अथवा' आदि विकल्पसूचक अव्यय छिपे हों, उसे वैकल्पिक द्वन्द्व कहते है।
इस समास में बहुधा दो विपरीतार्थक शब्दों का योग रहता है। जैसे- पाप-पुण्य, धर्माधर्म, भला-बुरा, थोड़ा-बहुत इत्यादि। यहाँ 'पाप-पुण्य' का अर्थ 'पाप' और 'पुण्य' भी प्रसंगानुसार हो सकता है।

(6) अव्ययीभाव समास:- 


अव्ययीभाव का लक्षण है- जिसमे पूर्वपद की प्रधानता हो और सामासिक या समास पद अव्यय हो जाय, उसे अव्ययीभाव समास कहते है।
सरल शब्दो में- जिस समास का पहला पद (पूर्वपद) अव्यय तथा प्रधान हो, उसे अव्ययीभाव समास कहते है।
इस समास में समूचा पद क्रियाविशेषण अव्यय हो जाता है। इसमें पहला पद उपसर्ग आदि जाति का अव्यय होता है और वही प्रधान होता है। जैसे- प्रतिदिन, यथासम्भव, यथाशक्ति, बेकाम, भरसक इत्यादि।
पहचान : पहला पद अनु, आ, प्रति, भर, यथा, यावत, हर आदि होता है।

अव्ययीभाववाले पदों का विग्रह- 


ऐसे समस्तपदों को तोड़ने में, अर्थात उनका विग्रह करने में हिन्दी में बड़ी कठिनाई होती है, विशेषतः संस्कृत के समस्त पदों का विग्रह करने में हिन्दी में जिन समस्त पदों में द्विरुक्तिमात्र होती है, वहाँ विग्रह करने में केवल दोनों पदों को अलग कर दिया जाता है।
जैसे- प्रतिदिन- दिन-दिन
यथाविधि- विधि के अनुसार
यथाक्रम- क्रम के अनुसार
यथाशक्ति- शक्ति के अनुसार
बेखटके- बिना खटके के
बेखबर- बिना खबर के
रातोंरात- रात ही रात में
कानोंकान- कान ही कान में
भुखमरा- भूख से मरा हुआ
आजन्म- जन्म से लेकर

पूर्वपद-अव्यय+उत्तरपद=समस्त-पदविग्रह
प्रति+दिन=प्रतिदिनप्रत्येक दिन
+जन्म=आजन्मजन्म से लेकर
यथा+संभव=यथासंभवजैसा संभव हो
अनु+रूप=अनुरूपरूप के योग्य
भर+पेट=भरपेटपेट भर के
हाथ+हाथ=हाथों-हाथहाथ ही हाथ में


(7)नत्र समास:- 


इसमे नहीं का बोध होता है। जैसे - अनपढ़, अनजान , अज्ञान ।
समस्त-पदविग्रह
अनाचारन आचार
अनदेखान देखा हुआ
अन्यायन न्याय
अनभिज्ञन अभिज्ञ
नालायकनहीं लायक
अचलन चल
नास्तिकन आस्तिक
अनुचितन उचित

समास-सम्बन्धी कुछ विशेष बातें-

(1)एक समस्त पद में एक से अधिक प्रकार के समास हो सकते है। यह विग्रह करने पर स्पष्ट होता है। जिस समास के अनुसार विग्रह होगा, वही समास उस पद में माना जायेगा।
जैसे-
(i)पीताम्बर- पीत है जो अम्बर (कर्मधारय),
पीत है अम्बर जिसका (बहुव्रीहि);
(ii)निडर- बिना डर का (अव्ययीभाव );
नहीं है डर जिसे (प्रादि का नञ बहुव्रीहि);
(iii) सुरूप - सुन्दर है जो रूप (कर्मधारय),
सुन्दर है रूप जिसका (बहुव्रीहि);
(iv) चन्द्रमुख- चन्द्र के समान मुख (कर्मधारय);
(v)बुद्धिबल- बुद्धि ही है बल (कर्मधारय);
(2) समासों का विग्रह करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि यथासम्भव समास में आये पदों के अनुसार ही विग्रह हो।
जैसे- पीताम्बर का विग्रह- 'पीत है जो अम्बर' अथवा 'पीत है अम्बर जिसका' ऐसा होना चाहिए। बहुधा संस्कृत के समासों, विशेषकर अव्ययीभाव, बहुव्रीहि और उपपद समासों का विग्रह हिन्दी के अनुसार करने में कठिनाई होती है। ऐसे स्थानों पर हिन्दी के शब्दों से सहायता ली जा सकती है।
जैसे- कुम्भकार =कुम्भ को बनानेवाला;
खग=आकाश में जानेवाला;
आमरण =मरण तक;
व्यर्थ =बिना अर्थ का;
विमल=मल से रहित; इत्यादि।
(3)अव्ययीभाव समास में दो ही पद होते है। बहुव्रीहि में भी साधारणतः दो ही पद रहते है। तत्पुरुष में दो से अधिक पद हो सकते है और द्वन्द्व में तो सभी समासों से अधिक पद रह सकते है।
जैसे- नोन-तेल-लकड़ी, आम-जामुन-कटहल-कचनार इत्यादि (द्वन्द्व)।
(4)यदि एक समस्त पद में अनेक समासवाले पदों का मेल हो तो अलग-अलग या एक साथ भी विग्रह किया जा सकता है।
जैसे- चक्रपाणिदर्शनार्थ-चक्र है पाणि में जिसके= चक्रपाणि (बहुव्रीहि);
दर्शन के अर्थ =दर्शनार्थ (अव्ययीभाव );
चक्रपाणि के दर्शनार्थ =चक्रपाणिदर्शनार्थ (अव्ययीभाव )। समूचा पद क्रियाविशेषण अव्यय है, इसलिए अव्ययीभाव है।

प्रयोग की दृष्टि से समास के भेद-

प्रयोग की दृष्टि से समास के तीन भेद किये जा सकते है-


  • (1)संयोगमूलक समास
  • (2)आश्रयमूलक समास 
  • (3)वर्णनमूलक समास


(1)संज्ञा-समास :- 


संयोगमूलक समास को संज्ञा-समास कहते है। इस प्रकार के समास में दोनों पद संज्ञा होते है।
दूसरे शब्दों में, इसमें दो संज्ञाओं का संयोग होता है।
जैसे- माँ-बाप, भाई-बहन, माँ-बेटी, सास-पतोहू, दिन-रात, रोटी-बेटी, माता-पिता, दही-बड़ा, दूध-दही, थाना-पुलिस, सूर्य-चन्द्र इत्यादि।

(2)विशेषण-समास:- 

यह आश्रयमूलक समास है। यह प्रायः कर्मधारय समास होता है। इस समास में प्रथम पद विशेषण होता है, किन्तु द्वितीय पद का अर्थ बलवान होता है। कर्मधारय का अर्थ है कर्म अथवा वृत्ति धारण करनेवाला। यह विशेषण-विशेष्य, विशेष्य-विशेषण, विशेषण तथा विशेष्य पदों द्वारा सम्पत्र होता है। जैसे-
(क) जहाँ पूर्वपद विशेषण हो; यथा- कच्चाकेला, शीशमहल, महरानी।
(ख)जहाँ उत्तरपद विशेषण हो; यथा- घनश्याम।
(ग़)जहाँ दोनों पद विशेषण हों; यथा- लाल-पीला, खट्टा-मीठा।
(घ) जहाँ दोनों पद विशेष्य हों; यथा- मौलवीसाहब, राजाबहादुर।

(3)अव्यय समास :- 

वर्णमूलक समास के अन्तर्गत बहुव्रीहि और अव्ययीभाव समास का निर्माण होता है। इस समास (अव्ययीभाव) में प्रथम पद साधारणतः अव्यय होता है और दूसरा पद संज्ञा। जैसे- यथाशक्ति, यथासाध्य, प्रतिमास, यथासम्भव, घड़ी-घड़ी, प्रत्येक, भरपेट, यथाशीघ्र इत्यादि।

सन्धि और समास में अन्तर


सन्धि और समास का अन्तर इस प्रकार है-
(i) समास में दो पदों का योग होता है; किन्तु सन्धि में दो वर्णो का।
(ii) समास में पदों के प्रत्यय समाप्त कर दिये जाते है। सन्धि के लिए दो वर्णों के मेल और विकार की गुंजाइश रहती है, जबकि समास को इस मेल या विकार से कोई मतलब नहीं।
(iii) सन्धि के तोड़ने को 'विच्छेद' कहते है, जबकि समास का 'विग्रह' होता है। जैसे- 'पीताम्बर' में दो पद है- 'पीत' और 'अम्बर' । सन्धिविच्छेद होगा- पीत+अम्बर;
जबकि समासविग्रह होगा- पीत है जो अम्बर या पीत है जिसका अम्बर = पीताम्बर। यहाँ ध्यान देने की बात है कि हिंदी में सन्धि केवल तत्सम पदों में होती है, जबकि समास संस्कृत तत्सम, हिन्दी, उर्दू हर प्रकार के पदों में। यही कारण है कि हिंदी पदों के समास में सन्धि आवश्यक नहीं है।
संधि में वर्णो के योग से वर्ण परिवर्तन भी होता है जबकि समास में ऐसा नहीं होता।

कर्मधारय और बहुव्रीहि समास में अंतर


इन दोनों समासों में अंतर समझने के लिए इनके विग्रह पर ध्यान देना चाहिए। कर्मधारय समास में एक पद विशेषण या उपमान होता है और दूसरा पद विशेष्य या उपमेय होता है। जैसे-'नीलगगन' में 'नील' विशेषण है तथा 'गगन' विशेष्य है। इसी तरह 'चरणकमल' में 'चरण' उपमेय है और 'कमल' उपमान है। अतः ये दोनों उदाहरण कर्मधारय समास के है।
बहुव्रीहि समास में समस्त पद ही किसी संज्ञा के विशेषण का कार्य करता है। जैसे- 'चक्रधर' चक्र को धारण करता है जो अर्थात 'श्रीकृष्ण'।
नीलकंठ- नीला है जो कंठ- (कर्मधारय)
नीलकंठ- नीला है कंठ जिसका अर्थात शिव- (बहुव्रीहि)
लंबोदर- मोटे पेट वाला- (कर्मधारय)
लंबोदर- लंबा है उदर जिसका अर्थात गणेश- (बहुव्रीहि)
महात्मा- महान है जो आत्मा- (कर्मधारय)
महात्मा- महान आत्मा है जिसकी अर्थात विशेष व्यक्ति- (बहुव्रीहि)
कमलनयन- कमल के समान नयन- (कर्मधारय)
कमलनयन- कमल के समान नयन हैं जिसके अर्थात विष्णु- (बहुव्रीहि)
पीतांबर- पीले हैं जो अंबर (वस्त्र)- (कर्मधारय)
पीतांबर- पीले अंबर हैं जिसके अर्थात कृष्ण- (बहुव्रीहि)

द्विगु और बहुव्रीहि समास में अंतर


द्विगु समास का पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है और दूसरा पद विशेष्य होता है जबकि बहुव्रीहि समास में समस्त पद ही विशेषण का कार्य करता है। जैसे-
चतुर्भुज- चार भुजाओं का समूह- द्विगु समास।
चतुर्भुज- चार है भुजाएँ जिसकी अर्थात विष्णु- बहुव्रीहि समास।
पंचवटी- पाँच वटों का समाहार- द्विगु समास।
पंचवटी- पाँच वटों से घिरा एक निश्चित स्थल अर्थात दंडकारण्य में स्थित वह स्थान जहाँ वनवासी राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ निवास किया- बहुव्रीहि समास।
त्रिलोचन- तीन लोचनों का समूह- द्विगु समास।
त्रिलोचन- तीन लोचन हैं जिसके अर्थात शिव- बहुव्रीहि समास।
दशानन- दस आननों का समूह- द्विगु समास।
दशानन- दस आनन हैं जिसके अर्थात रावण- बहुव्रीहि समास।

द्विगु और कर्मधारय में अंतर


(i) द्विगु का पहला पद हमेशा संख्यावाचक विशेषण होता है जो दूसरे पद की गिनती बताता है जबकि कर्मधारय का एक पद विशेषण होने पर भी संख्यावाचक कभी नहीं होता है।
(ii) द्विगु का पहला पद ही विशेषण बन कर प्रयोग में आता है जबकि कर्मधारय में कोई भी पद दूसरे पद का विशेषण हो सकता है। जैसे-
नवरत्न- नौ रत्नों का समूह- द्विगु समास
चतुर्वर्ण- चार वर्णो का समूह- द्विगु समास
पुरुषोत्तम- पुरुषों में जो है उत्तम- कर्मधारय समास
रक्तोत्पल- रक्त है जो उत्पल- कर्मधारय समास

सामासिक पदों की सूची


तत्पुरुष समास (कर्मतत्पुरुष)


पदविग्रह
गगनचुम्बीगगन (को) चूमनेवाला
चिड़ीमारचिड़ियों (को) मारनेवाला
कठखोदवाकाठ (को) खोदनेवाला
मुँहतोड़मुँह (को) तोड़नेवाला
अनुभव जन्यअनुभव से जन्य
उद्योगपतिउद्योग का पति (मालिक)
घुड़दौड़घोड़ों की दौड़



करणतत्पुरुष

पदविग्रह
प्रेमासिक्तप्रेम से सिक्त
रसभरारस से भरा
मेघाच्छत्रमेघ से आच्छत्र
रोगग्रस्तरोग से ग्रस्त
दुःखार्तदुःख से आर्त
देहचोरदेह से चोर


 सम्प्रदान तत्पुरुष

पदविग्रह
सभाभवनसभा के लिए भवन
मार्गव्ययमार्ग के लिए व्यय
मालगोदाममाल के लिए गोदाम


 अपादान तत्पुरुष

पदविग्रह
बलहीनबल से हीन
पदभ्रष्टपद से भ्रष्ट
मायारिक्तमाया से रिक्त
ऋणमुक्तऋण से मुक्त
स्थानच्युतस्थान से च्युत
नेत्रहीननेत्र से हीन
पथभ्रष्टपथ से भ्रष्ट



सम्बन्ध तत्पुरुष

पदविग्रह
अत्रदानअत्र का दान
वीरकन्यावीर की कन्या
राजभवनराजा का भवन
आनन्दाश्रमआनन्द का आश्रम



अधिकरण तत्पुरुष

पदविग्रह
पुरुषोत्तमपुरुषों में उत्तम
ग्रामवासग्राम में वास
आत्मनिर्भरआत्म पर निर्भर
शरणागतशरण में आगत



कर्मधारय समास

पदविग्रह
नवयुवकनव युवक
कापुरुषकुत्सित पुरुष
निलोत्पलनील उत्पल
सन्मार्गसत् मार्ग



विशेष्यपूर्वपदकर्मधारय

पदविग्रह
कुमारश्रवणाकुमारी (क्वांरी)
श्यामसुन्दरश्याम जो सुन्दर है
मदनमनोहरमदन जो मनोहर है
जनकखेतिहरजनक खेतिहर (खेती करनेवाला)

 विशेषणोभयपदकर्मधारय

पदविग्रह
नीलपीतनीला-पीला (दोनों मिले)
शीतोष्णशीत-उष्ण (दोनों मिले)
कृताकृतकिया-बेकिया
कहनी-अनकहनीकहना-न-कहना

 विशेष्योभयपदकर्मधारय

पदविग्रह
आम्रवृक्षआम्र है जो वृक्ष
वायसदम्पतिवायस है जो दम्पति

 उपमानकर्मधारय

पदविग्रह
विद्युद्वेगविद्युत के समान वेग
कुसुमकोमलकुसुम के समान कोमल
लौहपुरुषलोहे के समान पुरुष (कठोर)
शैलोत्रतशैल के समान उत्रत
घनश्यामघन-जैसा श्याम

उपमितकर्मधारय

पदविग्रह
चरणकमलचरण कमल के समान
अधरपल्लवअधर पल्लव के समान
पद पंकजपद पंकज के समान
मुखचन्द्रमुख चन्द्र के समान
नरसिंहनर सिंह के समान

 रूपकर्मधारय

पदविग्रह
पुरुषरत्नपुरुष ही है रत्न
मुखचन्द्रमुख ही है चन्द्र
भाष्याब्धिभाष्य ही है अब्धि
पुत्ररत्नपुत्र ही है रत्न

 अव्ययीभाव समास

पदविग्रह
दिनानुदिनदिन के बाद दिन
भरपेटपेट भरकर
निर्भयबिना भय का
प्रत्यक्षअक्षि के सामने
बखूबीखूबी के साथ
प्रत्येकएक-एक
यथाशीघ्रजितना शीघ्र हो



द्विगु कर्मधारय (समाहारद्विगु)

पदविग्रह
त्रिभुवनतीन भुवनों का समाहार
चवत्रीचार आनों का समाहार
त्रिगुणतीन गुणों का समूह
अष्टाध्यायीअष्ट अध्यायों का समाहार
पंचवटीपाँच वटों का समाहार
दुअत्रीदो आनों का समाहार
त्रिफलातीन फलों का समाहार



उत्तरपदप्रधानद्विगु

पदविग्रह
दुपहरदूसरा पहर
पंचहत्थड़पाँच हत्थड़ (हैण्डिल)
दुसूतीदो सूतोंवाला
शतांशशत (सौवाँ) अंश
पंचप्रमाणपाँच प्रमाण (नाप)
दुधारीदो धारोंवाली (तलवार)

बहुव्रीहि (समानाधिकरणबहुव्रीहि)

पदविग्रह
प्राप्तोदकप्राप्त है उदक जिसे
पीताम्बरपीत है अम्बर जिसका
निर्धननिर्गत है धन जिसका 


व्यधिकरणबहुव्रीहि

पदविग्रह
शूलपाणिशूल है पाणि में जिसके
वीणापाणिवीणा है पाणि में जिसके
चन्द्रभालचन्द्र है भाल पर जिसके
चन्द्रवदनचन्द्र है वदन पर जिसके

तुल्ययोग या सहबहुव्रीहि

पदविग्रह
सबलबल के साथ है जो
सदेहदेह के साथ है जो
सपरिवारपरिवार के साथ है जो
सचेतचेत (चेतना) के साथ है जो

व्यतिहारबहुव्रीहि

पदविग्रह
मुक्कामुक्कीमुक्के-मुक्के से जो लड़ाई हुई
डण्डाडण्डीडण्डे-डण्डे से जो लड़ाई हुई
लाठालाठीलाठी-लाठी से जो लड़ाई हुई

 प्रादिबहुव्रीहि

पदविग्रह
बेरहमनहीं है रहम जिसमें
निर्जननहीं है जन जहाँ

द्वन्द्व (इतरेतरद्वन्द्व)

पदविग्रह
धर्माधर्मधर्म और अधर्म
गौरी-शंकरगौरी और शंकर
लेनदेनलेन और देन
पापपुण्यपाप और पुण्य
शिव-पार्वतीशिव और पार्वती  
देश-विदेशदेश और विदेश
हरि-शंकरहरि और शंकर



 समाहारद्वन्द्व

पदविग्रह
रुपया-पैसारुपया-पैसा वगैरह
घर-द्वारघर-द्वार वगैरह (परिवार)
नहाया-धोयानहाया और धोया आदि
घर-आँगनघर-आँगन वगैरह (परिवार)
नाक-काननाक-कान वगैरह
कपड़ा-लत्ताकपड़ा-लत्ता वगैरह

 वैकल्पिकद्वन्द्व

पदविग्रह
पाप-पुण्यपाप या पुण्य
लाभालाभलाभ या अलाभ
थोड़ा-बहुतथोड़ा या बहुत
भला-बुराभला या बुरा
धर्माधर्मधर्म या अध


 नञ समास

पदविग्रह
अनाचारन आचार
अनदेखान देखा हुआ
अन्यायन न्याय
अनभिज्ञन अभिज्ञ
नालायकनहीं लायक
अचलन चल
अधर्मन धर्म

Conclusion 

हैल्लो दोस्तों जैसा कि आज हमारी पोस्ट samas in hindi है उसी तरह कि कई पोस्ट मै लिख चूका हू उन सब का लिंक मैंने पोस्ट मे दिया हुआ है यह एक तरह से hindi vyakaran कि एक सीरीज है और मै यही चाहता हू कि एजुकेशन से रिलेटेड जितने भी टॉपिक है वो सब आप लोगो के साथ शेयर करू ताकि आप लोगो को कही और न जाना पड़े और आप लोगो का समय भी बचे और अगर पोस्ट मे किसी भी तरह कि कोई कमी रह गयी हो तो कृपा मुझे कमैंट्स करके जरूर बताये और कोई डाउट हो मन में तो वो भी पूछ सकते हो

3 comments:

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